देव दिवाली 2025: कार्तिक पूर्णिमा पर देवी-देवताओं के स्वागत की तैयारियां, जानें तिथि और पूजा विधि 

  1. वाराणसी। दिवाली के ठीक पंद्रह दिन बाद कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर देव दिवाली का पर्व बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन देवी-देवता स्वयं पृथ्वी पर अवतरित होकर काशी के गंगा घाटों पर दीपोत्सव मनाते हैं। इसी कारण इसे देवताओं की दिवाली कहा जाता है। इस दिन गंगा स्नान, दीपदान और दान-पुण्य का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा के साथ देव दिवाली पर स्नान और दान करता है, उसके जीवन में सुख-समृद्धि आती है और घर स्वर्ग के समान हो जाता है।

 

**देव दिवाली की तिथि**

हिंदू पंचांग के अनुसार, इस वर्ष देव दिवाली का पर्व 4 नवंबर की रात 10 बजकर 36 मिनट से आरंभ होकर 5 नवंबर की शाम 6 बजकर 48 मिनट तक रहेगा। उदया तिथि के अनुसार, देव दिवाली का उत्सव 5 नवंबर को मनाया जाएगा।

 

देव दिवाली की रात के विशेष उपाय

 

1. उत्तर दिशा में दीपक जलाना

  1. देव दिवाली की रात घर की उत्तर दिशा में दीपक जलाना अत्यंत शुभ माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिशा में देवी लक्ष्मी और भगवान कुबेर का वास होता है। इस दिन इस दिशा में दीपक जलाने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और आर्थिक कष्ट दूर होते हैं।

 

2. दान का महत्व

मान्यता है कि देव दिवाली की रात भगवान विष्णु क्षीरसागर में विश्राम करते हैं। इस अवसर पर पीले वस्त्र, पीला अनाज, गुड़, केले, चंदन, केसर या अन्य पीली वस्तुओं का दान करना अत्यंत फलदायी होता है। जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या धन का दान भी शुभ माना गया है।

तुलसी पूजन और दीपदान

शाम के समय तुलसी के पौधे के पास घी का दीपक जलाना शुभ फल देता है। इसके बाद तुलसी की तीन बार परिक्रमा कर मां लक्ष्मी के मंत्रों का जाप करें। भगवान विष्णु की आराधना कर उन्हें तुलसी दल अर्पित करना और घर में नया तुलसी पौधा रोपना भी अत्यंत मंगलकारी माना गया है।

देव दिवाली का यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह उजाले, पवित्रता और सकारात्मकता के प्रसार का संदेश भी देता है।

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