जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर में रविवार रात लगी आग ने एक बार फिर स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई सामने रख दी। जहाँ मरीज इलाज की उम्मीद लेकर आते हैं, वहीं से कईयों की लाशें निकलती हैं। यह कोई पहला मामला नहीं है; हर कुछ महीनों में किसी न किसी राज्य से अस्पताल में आग लगने, ऑक्सीजन की कमी या उपकरणों के फेल होने की खबरें आती हैं। सवाल यह है कि इन हादसों से सबक क्यों नहीं लिया जाता?
राजस्थान की राजधानी जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर में रविवार देर रात लगी भीषण आग में 8 लोगों की मौत हो गई। आग शॉर्ट सर्किट के कारण लगी बताई जा रही है। जिस समय हादसा हुआ, उस वक्त आईसीयू में 11 मरीजों का इलाज चल रहा था। धुआं फैलते ही मरीज और तीमारदार गद्दे-बेड लेकर भागने लगे, लेकिन कई जिंदगियां बच नहीं सकीं। परिजनों ने आरोप लगाया कि आग लगते ही डॉक्टर और स्टाफ मौके से भाग खड़े हुए। यह बयान जितना दर्दनाक है, उतना ही हमारे सिस्टम पर करारा तमाचा भी।
जयपुर की यह घटना नई नहीं। पिछले दो वर्षों में देशभर में अस्पतालों में दर्जनों बड़े हादसे हुए। जिसमें 2024 में दिल्ली के विवेक विहार अस्पताल में आग लगने से कई नवजातों की मौत हुई थी। महाराष्ट्र के भंडारा जिला अस्पताल में 2021 में 10 बच्चों की जान चली गई थी। छत्तीसगढ़, गुजरात और यूपी के कई अस्पतालों में वेंटिलेटर फेल होने या शॉर्ट सर्किट से हादसे हुए हैं। हर बार जांच कमेटी बनती है, रिपोर्ट आती है, कुछ अफसर निलंबित होते हैं, और फिर सब भूल जाते हैं। जब तक अगली त्रासदी न हो जाए।
स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड बताते हैं कि राज्य के करीब 60% सरकारी अस्पतालों में अग्नि सुरक्षा मानकों का पालन नहीं होता। अग्निशमन यंत्र या तो पुराने हैं या काम नहीं करते। आपात निकासी मार्ग अक्सर ब्लॉक रहते हैं। बिजली व्यवस्था जर्जर है और जनरेटर समय पर चालू नहीं होते और सबसे अहम कर्मचारियों को आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण ही नहीं दिया जाता। हादसे के बाद अस्पतालों में तात्कालिक मरम्मत या जांच का दौर चलता है, लेकिन कुछ ही हफ्तों में सब पुराने ढर्रे पर लौट आता है।
भारत स्वास्थ्य के क्षेत्र में तेजी से खर्च बढ़ा रहा है, लेकिन सुविधाओं और निगरानी का ढांचा कमजोर है। ग्रामीण इलाकों में तो अस्पतालों की स्थिति और बदतर है। न बिजली का भरोसा, न उपकरणों का रखरखाव। छत्तीसगढ़, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में जिला अस्पतालों तक में ICU या वेंटिलेटर सीमित हैं। जयपुर जैसा बड़ा शहर भी इससे अछूता नहीं है। जब राजधानी के सबसे बड़े अस्पताल में यह हाल है, तो छोटे कस्बों और ब्लॉकों की स्थिति का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है।
हर बार सरकारें ‘उच्च स्तरीय जांच समिति’ बनाकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल देती हैं। लेकिन ज़रूरत है। प्रणालीगत बदलाव की। जैसे कि, अस्पतालों में नियमित फायर सेफ्टी ऑडिट हो। लापरवाही पाए जाने पर अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय हो। कर्मचारियों को आपातकालीन प्रशिक्षण दिया जाए। और सबसे जरूरी, मरीजों की सुरक्षा को ‘बजट मद’ नहीं बल्कि मानवीय प्राथमिकता बनाया जाए।
जयपुर का हादसा हमें याद दिलाता है कि भारत में अस्पताल अब इलाज और उम्मीद की जगह नहीं रहे, बल्कि सिस्टम की लापरवाही के प्रतीकबन गए हैं। हर आग, हर मौत, और हर जांच यह कहती है कि सुधार की ज़रूरत ‘नीतियों’ में नहीं, ‘नियत’ में है। अब वक्त है कि सरकारें यह समझें। मरीज सिर्फ आंकड़ा नहीं, इंसान हैं। और अस्पताल, अगर सुरक्षा के बिना हैं, तो वे इलाज का नहीं, लापरवाही का अड्डा बन जाते हैं।




