छठ पूजा: सूर्य उपासना और छठी मैया की भक्ति का संगम, जानें इसके पीछे की पौराणिक मान्यता

लोक आस्था का महापर्व छठ सूर्य देव की उपासना और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का अनूठा पर्व है। यह उत्सव न केवल सूर्य देव को समर्पित है, बल्कि छठी मैया की भक्ति का भी प्रतीक माना जाता है। इस पर्व में प्रत्यक्ष देवता सूर्य और लोक देवी छठी मैया की संयुक्त पूजा की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है।

सूर्य देव की बहन मानी जाती हैं छठी मैया
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, छठी मैया को सूर्य देव की बहन कहा गया है। इसलिए छठ पूजा के दौरान व्रती सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित कर उनकी बहन छठी मैया की कृपा प्राप्त करने की कामना करते हैं। यह पर्व भाई-बहन के पवित्र रिश्ते और प्रकृति के सामंजस्य का प्रतीक है।
‘छठ’ शब्द संस्कृत के ‘षष्ठी’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है छठा दिन। इसीलिए यह पर्व कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। मान्यता है कि छठी मैया बालकों की रक्षा करती हैं और परिवार के कल्याण के लिए आशीर्वाद देती हैं। महिलाएं यह व्रत संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए रखती हैं।

सूर्य और शक्ति की संयुक्त उपासना
धर्मशास्त्रों के अनुसार, किसी भी देवता की पूजा से पहले उनकी शक्ति की आराधना करना आवश्यक माना गया है। इसी आधार पर छठी मैया को सूर्य देव की शक्ति स्वरूपा भी कहा गया है। इसलिए छठ पर्व में सूर्य उपासना से पहले छठी मैया की पूजा की जाती है। यह परंपरा शक्ति और ऊर्जा के उस संतुलन को दर्शाती है, जो सृष्टि के संचालन का मूल आधार है।

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