सूर्य उपासना का पर्व, कल दिया जाएगा पहला अर्घ्य, जानें समय ल, मने और विधि

आस्था और सूर्य उपासना का महापर्व छठ पूजा चार दिनों तक चलने वाला व्रत है, जो सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित है। इस पर्व में महिलाएं अपनी संतान की लंबी आयु और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए 36 घंटे का निर्जला व्रत रखती हैं। इसे हिंदू धर्म के सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है।

छठ पूजा की शुरुआत नहाय-खाय से होती है, इसके बाद खरना के दिन व्रती 36 घंटे का उपवास आरंभ करते हैं। इस पर्व में सूर्य देव को दो बार अर्घ्य दिया जाता है—पहला संध्या अर्घ्य डूबते सूर्य को और दूसरा उषा अर्घ्य उगते सूर्य को अर्पित किया जाता है।

संध्या अर्घ्य का समय

इस वर्ष संध्या अर्घ्य सोमवार, 27 अक्टूबर को शाम 4:50 से 5:41 बजे के बीच दिया जाएगा। इस दौरान व्रती सूर्य देव और षष्ठी माता के मंत्रों का जाप करते हुए अर्घ्य अर्पित करते हैं।

संध्या अर्घ्य की विधि

कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को संध्या अर्घ्य दिया जाता है। व्रती नदी, तालाब या जलाशय के किनारे कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्यास्त के समय दूध और जल मिलाकर अर्घ्य अर्पित करते हैं। बांस की टोकरी में ठेकुआ, फल, नारियल, गन्ना और चावल के लड्डू रखे जाते हैं, जिन्हें सूप में सजाकर सूर्य देव को अर्पित किया जाता है। इस दौरान छठी मैया के लोकगीत या मंत्रों का गायन किया जाता है।

अर्घ्य देने के मंत्र

छठ पूजा में सूर्य देव को अर्घ्य देते समय निम्न मंत्रों का जाप किया जाता है—
ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय नमः
ॐ घृणि सूर्याय नमः
ॐ आदित्याय नमः

इनमें से “ॐ घृणि सूर्याय नमः” सबसे प्रचलित मंत्र है, जिसे अर्घ्य देते समय बार-बार दोहराना शुभ माना जाता है।

संध्या अर्घ्य का महत्व

संध्या अर्घ्य स्वास्थ्य, समृद्धि और मानसिक शांति का प्रतीक माना जाता है। यह प्रकृति और सूर्य ऊर्जा के प्रति आभार प्रकट करने का अनुष्ठान है। डूबते सूर्य को अर्घ्य देना जीवन के उतार-चढ़ाव को स्वीकार करने और सकारात्मकता का संदेश देता है। व्रती इस अवसर पर अपनी संतान के कल्याण और दीर्घायु की कामना करते हैं।

अर्घ्य देने के नियम

अर्घ्य देते समय मुख पूर्व दिशा की ओर रखें। दोनों हाथों से जल को सिर के ऊपर उठाकर अर्पित करें। जल में चंदन, रोली या लाल फूल मिलाना शुभ माना जाता है। अर्घ्य के बाद सूर्य नमस्कार करें और तीन परिक्रमा लगाएं। जल को पैरों में न गिरने दें, इसे किसी गमले या मिट्टी में विसर्जित करें।

छठ पूजा का यह पर्व सूर्य उपासना के साथ आत्मसंयम, श्रद्धा और पर्यावरण के प्रति आभार का प्रतीक है, जो हर वर्ष समाज को एकजुटता और सकारात्मक ऊर्जा का संदेश देता है।

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