नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने विचाराधीन कैदियों को मतदान का अधिकार देने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई शुरू की है। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 62(5) के तहत विचाराधीन कैदियों को मतदान से वंचित किया जाता है, जबकि हाल के फैसलों में मतदान को मौलिक अधिकार माना गया है। याचिका में जेलों में मतदान केंद्र स्थापित करने या डाक मतपत्र की सुविधा देने की मांग की गई है, ताकि 3.9 लाख विचाराधीन कैदियों को उनके अधिकार मिल सकें।
कानूनी विसंगति और याचिका का आधार
1997 के अनुकूल चंद्र प्रधान मामले में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 62(5) को बरकरार रखा था, तब मतदान को केवल संवैधानिक अधिकार माना गया। लेकिन 2023 के अनूप बरनवाल मामले में कोर्ट ने इसे मौलिक अधिकार माना, जिससे यह बहस फिर शुरू हुई। याचिकाकर्ता सुनीता शर्मा का तर्क है कि दोषी करार न दिए गए व्यक्तियों को मतदान से वंचित करना अनुचित है। एनसीआरबी की 2023 की प्रिजन स्टैटिस्टिक्स के अनुसार, 5.3 लाख कैदियों में से 73.5% यानी 3.9 लाख विचाराधीन हैं, जिनमें से कई बाद में बरी हो जाते हैं। फिर भी, उन्हें वर्षों तक मताधिकार से वंचित रखा जाता है।
अंतरराष्ट्रीय तुलना और मांग
याचिका में कहा गया कि पाकिस्तान, दक्षिण अफ्रीका, ब्रिटेन, फ्रांस जैसे देश विचाराधीन कैदियों को मतदान का अधिकार देते हैं। भारत में यह प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) के उल्लंघन का कारण बनता है। याचिका में मांग की गई है कि चुनाव आयोग जेलों में मतदान केंद्र बनाए या डाक मतपत्र की व्यवस्था करे, सिवाय उन कैदियों के जो भ्रष्टाचार के दोषी हों। याचिकाकर्ता ने धारा 62(5) में संशोधन की भी मांग की, ताकि केवल विशिष्ट अपराधों में दोषी कैदियों को मतदान से वंचित किया जाए।
सवाल और बहस
याचिका यह सवाल उठाती है कि यदि जमानत पर बाहर का व्यक्ति मतदान कर सकता है, तो विचाराधीन कैदी क्यों नहीं? सिविल जेल में बंद देनदारों को भी यह अधिकार नहीं, जो उचित वर्गीकरण का अभाव दर्शाता है। कोर्ट का फैसला इस जटिल मुद्दे पर नया दृष्टिकोण ला सकता है।




