नई दिल्ली
देश के 12 राज्यों में मतदाता सूची के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) की प्रक्रिया 4 नवंबर से शुरू हो गई है, जो 4 दिसंबर तक चलेगी। लेकिन इस प्रक्रिया को लेकर सबसे तीखा विरोध पश्चिम बंगाल में देखने को मिला। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने शुरू में चुनाव आयोग और केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था, पर अब पार्टी का रुख नरम होता दिख रहा है। ममता बनर्जी ने जिस तीव्रता से शुरुआत की थी, अब उतनी ही तेजी से उन्होंने विरोध को ‘नियंत्रित सहयोग’ में बदल दिया है।
चुनाव आयोग द्वारा SIR की घोषणा के बाद ममता बनर्जी ने इसे लोकतंत्र पर “सर्जिकल स्ट्राइक” बताया था। तृणमूल कांग्रेस ने अपने कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) का विरोध करने का निर्देश दिया था। पार्टी ने आशंका जताई थी कि बंगाल में करीब एक करोड़ वोटरों के नाम सूची से हटाए जा सकते हैं, खासकर मुस्लिम बहुल जिलों मुर्शिदाबाद और मालदा में। टीएमसी ने सुप्रीम कोर्ट जाने की चेतावनी भी दी थी। लेकिन एक सप्ताह के भीतर ही पार्टी का रुख बदल गया और ममता ने कार्यकर्ताओं से BLO के साथ सहयोग करने, नए वोटर जोड़ने और गलत कटौती पर आपत्ति दर्ज कराने को कहा।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस बदलाव के पीछे दो मुख्य कारण हैं। पहला, केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से टकराव के चलते राष्ट्रपति शासन लागू होने की आशंका। भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने हाल ही में कहा था कि ममता की अराजकता अनुच्छेद 356 लागू करने का आधार बन रही है। ममता को एहसास है कि यदि उन्होंने SIR जैसी संवैधानिक प्रक्रिया को रोका, तो केंद्र इसे संवैधानिक अवमानना बताकर कार्रवाई कर सकता है, जिससे उनकी सरकार के लिए संकट खड़ा हो सकता है।
दूसरा कारण सुप्रीम कोर्ट का हालिया रुख है। जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में SIR रोकने की आरजेडी की याचिका खारिज करते हुए कहा था कि चुनाव आयोग की स्वायत्तता में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। कानूनी सलाहकारों ने ममता को चेताया कि अदालत में जल्दबाजी दिखाना ‘अड़ंगा लगाने’ के रूप में देखा जाएगा। इसी वजह से उन्होंने विरोध को एक सीमा तक सीमित रखा।
इसके अलावा, ममता बनर्जी अपने वोटबैंक की भी राजनीति समझती हैं। बंगाल में मुस्लिम मतदाता उनका प्रमुख आधार हैं। भाजपा लगातार उन पर ‘घुसपैठियों’ को संरक्षण देने का आरोप लगाती रही है, जबकि ममता इन आरोपों को राजनीतिक हमला बताकर खारिज करती हैं। वे SIR को NRC से जोड़कर मुस्लिम मतदाताओं को भरोसा दिलाना चाहती हैं कि उनके अधिकार सुरक्षित हैं। हाल ही में उन्होंने कोलकाता में 4 किलोमीटर लंबा मार्च निकालकर कहा था कि यदि किसी का नाम गलत तरीके से मतदाता सूची से हटाया गया तो वे केंद्र सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरेंगी।
कुल मिलाकर, ममता बनर्जी ने अब अपनी रणनीति बदल दी है। पहले जहां उन्होंने टकराव का रास्ता चुना था, वहीं अब वे संवैधानिक दायरे में रहकर राजनीतिक संदेश देने की नीति पर लौट आई हैं।




