बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 1994 के महासमुंद जिले के बनियाटोरा गांव में हुए अंधविश्वास से प्रेरित हत्याकांड में बड़ा फैसला सुनाया है। डिवीजन बेंच ने ट्रायल कोर्ट के बरी करने के आदेश को रद्द करते हुए सभी आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302/149 के तहत दोषी ठहराया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सक की गवाही नहीं होने मात्र से आरोपी बरी नहीं किए जा सकते। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(2) के तहत पोस्टमार्टम रिपोर्ट बिना चिकित्सक के बयान के भी प्रमाण के रूप में स्वीकार्य है, बशर्ते अन्य साक्ष्य मजबूत हों। हाईकोर्ट ने इसे ट्रायल कोर्ट की गंभीर कानूनी त्रुटि करार दिया।
घटना 5 फरवरी 1994 की है। गांव में रतन नामक युवक पर भूत-प्रेत साया होने की आशंका जताते हुए झाड़-फूंक की गई। अगले दिन ग्रामीणों ने रतन और उसकी बहू को डायन बताकर हमला किया। भीड़ ने रतन की पत्नी, बेटे और बहू की पिटाई की, फिर रतन को घसीटकर बाड़ी में ले जाकर कुल्हाड़ी और लाठी-डंडों से बेरहमी से मार डाला।
मामले में घायल हुए मृतक के बेटे, पत्नी और पिता ने कोर्ट में गवाही दी कि 10 से अधिक हथियारबंद आरोपी मारने की नीयत से आए थे। जांच में बरामद हथियारों पर खून के धब्बे मिले थे। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी मृत्यु का कारण सिर और शरीर पर गंभीर चोटें बताया गया था।
ट्रायल कोर्ट ने केवल चिकित्सक की गवाही नहीं होने के आधार पर सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। हाईकोर्ट ने इसे न्यायिक प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला मनमाना निर्णय बताया। कोर्ट ने कहा कि घायल प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही, बरामद हथियार और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से हत्या का अपराध पूर्णतः सिद्ध होता है।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला निरस्त करते हुए सभी आरोपियों को दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा सुनाई। अदालत ने एक माह के भीतर सरेंडर करने का निर्देश दिया है, अन्यथा पुलिस को गिरफ्तारी सुनिश्चित करने के आदेश जारी किए गए हैं।




